बिलासपुर,27 दिसंबर,2025/मध्य प्रदेश शासन एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में इंदौर में आयोजित इंदल महोत्सव में छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोक संस्कृति ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई।
देश के 12 राज्यों से आए लोक कलाकारों की सहभागिता वाले इस महोत्सव में छत्तीसगढ़ के गेड़ी लोक नृत्य को आमंत्रित किया गया,जो प्रदेश के लिए ग़ौरव की बात है।
छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित संस्था लोक श्रृंगार भारती, तिफरा (बिलासपुर) के गेड़ी नृत्य दल ने महोत्सव में शानदार प्रस्तुति दी। मध्य प्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री मंगूभाई पटेल के मुख्य आतिथ्य में आयोजित इस सांस्कृतिक आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण गेड़ी नृत्य दल की प्रस्तुति रही।
कौड़ियों, चीनी मिट्टी की मालाओं, पटसन वस्त्र, सिकबंध, मयूर पंख, पैरों में घुंघरू और रंगीन गेड़ियों से सुसज्जित कलाकारों ने जब मंच पर नृत्य प्रारंभ किया, तो पूरा महोत्सव स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अनिल कुमार गढ़ेवाल के कुशल नेतृत्व में दल ने अनुशासित एवं ऊर्जावान प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। गढ़ेवाल द्वारा गाया गया पारंपरिक गेड़ी गीत “काट ले हरियर बांसे जो भला” इंदौरवासियों को झूमने पर मजबूर कर गया।मुख्य मांदल वादक संजय रात्रे एवं मोहन डोंगरे के सशक्त वादन ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई, वहीं महेश नवरंग की बांसुरी की मधुर स्वर लहरियों पर दर्शक भावविभोर नजर आए। सौखी लाल कोसले ने हारमोनियम वादन किया, जबकि सहगायक के रूप में भरत वस्त्रकर एवं फागूलाल सूर्यवंशी ने सहभागिता निभाई।
मुख्य गेड़ी नर्तक प्रभात बंजारे एवं सूरज खांडे के गेड़ी पर संतुलन साधे रहने के दौरान शुभम भार्गव द्वारा उनके कंधों पर खड़े होकर गेड़ी को हवा में लहराने का दृश्य दर्शकों के लिए अविस्मरणीय बन गया। वहीं लक्ष्मी नारायण माण्डले और फूलचंद ओगरे ने एक ही गेड़ी पर नृत्य कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। सह गेड़ी नर्तकों के रूप में मनोज माण्डले, सुनील गेंदले, शुभम भारद्वाज, उदय खांडे, गेंदलाल एवं चंद्रशेखर यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उल्लेखनीय है कि इसी माह संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं यूनेस्को के संयुक्त तत्वावधान में नई दिल्ली के लाल किला परिसर में आयोजित कार्यक्रम में भी गेड़ी लोक नृत्य की प्रस्तुति ने 180 देशों के प्रतिनिधियों का मन मोह लिया था। सफल प्रस्तुतियों के पश्चात यूनेस्को द्वारा गेड़ी लोक नृत्य को अत्यंत प्राचीन लोक नृत्यों की सूची में शामिल किए जाने के संकेत भी दिए गए हैं।
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