August 23, 2026

संस्कार, संगठन और समरसता का संदेश देकर संपन्न हुआ संघ का प्रांतीय घोष वर्ग

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बिलासपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छत्तीसगढ़ प्रांत द्वारा आयोजित 15 दिवसीय प्रांतीय घोष वर्ग (नगरीय शिविर) का भव्य समापन महासमुंद स्थित सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना के वातावरण के बीच संपन्न हुआ। 10 मई से प्रारंभ हुए इस विशेष प्रशिक्षण वर्ग के अंतिम दिवस स्वयंसेवकों ने घोष वाद्य यंत्रों के माध्यम से ऐसी सजीव और समन्वित प्रस्तुति दी कि पूरा परिसर राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत हो उठा।

कार्यक्रम में घोष वादन की पारंपरिक शैली और आधुनिक प्रस्तुति का अद्भुत संगम देखने को मिला। शंख, आनक (ढोल), प्रणव (साइड ड्रम) सहित विभिन्न घोष वाद्यों की स्वर लहरियों ने उपस्थित जनसमूह को भारतीय संस्कृति और संगठन शक्ति का जीवंत अनुभव कराया। स्वयंसेवकों की अनुशासित कदमताल, सामूहिक जुगलबंदी और एकरूपता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित नागरिकों ने करतल ध्वनि से उनका उत्साहवर्धन किया।

समापन समारोह के मुख्य वक्ता संघ के प्रांत प्रचारक नारायण नामदेव ने अपने उद्बोधन में कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण और समाज को संगठित करना है। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त होता है। संघ समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर सामाजिक समरसता, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय चेतना के कार्यों को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि संघ किसी व्यक्ति विशेष या सत्ता केंद्रित विचार पर नहीं, बल्कि राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर कार्य करता है।

उन्होंने संघ स्थापना की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश जब सामाजिक विखंडन, आत्मविस्मृति और सांस्कृतिक हीनभावना से गुजर रहा था, तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज को संगठित करने और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के उद्देश्य से संघ की स्थापना की। संघ की शाखा पद्धति केवल शारीरिक या बौद्धिक प्रशिक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, आत्मविश्वास और समाज समर्पण की जीवनशैली का निर्माण करती है।

नारायण नामदेव ने कहा कि आज समाज परिवर्तन के लिए केवल नारों की नहीं, बल्कि चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ युवाओं की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत को पुनः वैभवशाली बनाने के लिए ऐसे युवाओं की जरूरत है जिनमें स्वामी विवेकानंद जैसा आत्मविश्वास, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा राष्ट्रधर्म और भगत सिंह जैसा त्याग और साहस हो। उन्होंने कहा कि ऐसे युवाओं का निर्माण तभी संभव है जब मातृशक्ति भी भुवनेश्वरी देवी और राजमाता जिजाबाई के समान संस्कारवान, राष्ट्रनिष्ठ और प्रेरणास्रोत भूमिका निभाए। माताएं ही राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती हैं और परिवार ही संस्कारों की प्रथम पाठशाला है।

उन्होंने आगे कहा कि संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है और इस अवसर पर समाज जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से “पंच परिवर्तन” विषय पर विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है। समाज में सामाजिक समरसता का वातावरण निर्मित करना, परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण फैलाना, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्यों के प्रति समाज को प्रेरित करना तथा राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव को नई पीढ़ी तक पहुंचाना संघ के प्रमुख कार्यों में शामिल है। उन्होंने कहा कि संगठित और संस्कारित समाज ही राष्ट्र को आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बना सकता है।

अपने संबोधन में उन्होंने स्वयंसेवकों का आह्वान करते हुए कहा कि शाखा में प्राप्त प्रशिक्षण को केवल शिविर तक सीमित न रखें, बल्कि अपने गांव, मोहल्ले और समाज में जाकर सेवा, संस्कार और संगठन के कार्यों का विस्तार करें। उन्होंने कहा कि वंचित, पीड़ित और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचना ही वास्तविक राष्ट्रसेवा है।

कार्यक्रम में शाम 6 बजे से बड़ी संख्या में नगरवासी, अभिभावक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। घोष वादन के साथ स्वयंसेवकों की अनुशासित प्रस्तुति ने भारतीय संगठन परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का प्रभावशाली चित्र उपस्थित किया। कार्यक्रम का वातावरण राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव से सराबोर रहा।

प्रांतीय घोष वर्ग में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से चयनित 110 शिक्षार्थी स्वयंसेवकों ने सहभागिता की। इनके प्रशिक्षण के लिए 20 प्रशिक्षक एवं 40 व्यवस्थापक स्वयंसेवक निरंतर कार्यरत रहे। 15 दिनों तक चले इस वर्ग में घोष प्रशिक्षण के साथ शारीरिक, बौद्धिक और संगठनात्मक विषयों पर भी मार्गदर्शन दिया गया। समापन के साथ स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्रों में राष्ट्रकार्य और समाज जागरण के संकल्प के साथ लौटे।

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